Akbar Allahabadi

Vo Havaa Na Rahii Vo Chaman Na Rahaa Vo Galii Na Rahii Vo Hasiin Na Rahe Akbar Allahabadi Ghazals

वो हवा न रही वो चमन न रहा वो गली न रही वो हसीं न रहे वो फ़लक न रहा वो समाँ न रहा वो मकाँ न रहे वो मकीं न रहे वो गुलों में गुलों की सी बू न रही वो अज़ीज़ों में लुत्फ़ की ख़ू न रही वो हसीनों में रंग-ए-वफ़ा न रहा कहें और की क्या वो हमीं न रहे न वो आन रही न उमंग रही न वो रिंदी ओ ज़ोहद की जंग रही सू-ए-क़िबला निगाहों के रुख़ न रहे और दर पे नक़्श-ए-जबीं न रहे न वो जाम रहे न वो मस्त रहे न फ़िदाई-ए-अहद-ए...

Zid Hai Unhen Puuraa Miraa Armaan Na Karenge Akbar Allahabadi Ghazals

ज़िद है उन्हें पूरा मिरा अरमाँ न करेंगे मुँह से जो नहीं निकली है अब हाँ न करेंगे क्यूँ ज़ुल्फ़ का बोसा मुझे लेने नहीं देते कहते हैं कि वल्लाह परेशाँ न करेंगे है ज़ेहन में इक बात तुम्हारे मुतअल्लिक़ ख़ल्वत में जो पूछोगे तो पिन्हाँ न करेंगे वाइज़ तो बनाते हैं मुसलमान को काफ़िर अफ़्सोस ये काफ़िर को मुसलमाँ न करेंगे क्यूँ शुक्र-गुज़ारी का मुझे शौक़ है इतना सुनता हूँ वो मुझ पर कोई एहसाँ न करेंगे...

Na Haasil Huaa Sabr O Aaraam Dil Kaa Akbar Allahabadi Ghazals

न हासिल हुआ सब्र-ओ-आराम दिल का न निकला कभी तुम से कुछ काम दिल का मोहब्बत का नश्शा रहे क्यूँ न हर-दम भरा है मय-ए-इश्क़ से जाम दिल का फँसाया तो आँखों ने दाम-ए-बला में मगर इश्क़ में हो गया नाम दिल का हुआ ख़्वाब रुस्वा ये इश्क़-ए-बुताँ में ख़ुदा ही है अब मेरे बदनाम दिल का ये बाँकी अदाएँ ये तिरछी निगाहें यही ले गईं सब्र-ओ-आराम दिल का धुआँ पहले उठता था आग़ाज़ था वो हुआ ख़ाक अब ये है अंजाम दिल का जब...

Na Ruuh E Mazhab Na Qalb E Aarif Na Shaairaana Zabaan Baaqii Akbar Allahabadi Ghazals

न रूह-ए-मज़हब न क़ल्ब-ए-आरिफ़ न शाइ’राना ज़बान बाक़ी ज़मीं हमारी बदल गई है अगरचे है आसमान बाक़ी शब-ए-गुज़िश्ता के साज़ ओ सामाँ के अब कहाँ हैं निशान बाक़ी ज़बान-ए-शमा-ए-सहर पे हसरत की रह गई दास्तान बाक़ी जो ज़िक्र आता है आख़िरत का तो आप होते हैं साफ़ मुनकिर ख़ुदा की निस्बत भी देखता हूँ यक़ीन रुख़्सत गुमान बाक़ी फ़ुज़ूल है उन की बद-दिमाग़ी कहाँ है फ़रियाद अब लबों पर ये वार पर वार अब अबस हैं...