Habib Jalib

Yuun Vo Zulmat Se Rahaa Dast O Garebaan Yaaro Habib Jalib Ghazals

यूँ वो ज़ुल्मत से रहा दस्त-ओ-गरेबाँ यारो उस से लर्ज़ां थे बहुत शब के निगहबाँ यारो उस ने हर-गाम दिया हौसला-ए-ताज़ा हमें वो न इक पल भी रहा हम से गुरेज़ाँ यारो उस ने मानी न कभी तीरगी-ए-शब से शिकस्त दिल अँधेरों में रहा उस का फ़रोज़ाँ यारो उस को हर हाल में जीने की अदा आती थी वो न हालात से होता था परेशाँ यारो उस ने बातिल से न ता-ज़ीस्त किया समझौता दहर में उस सा कहाँ साहब-ए-ईमाँ यारो उस को थी कश्मकश-ए...

Na Dagmagaae Kabhii Ham Vafaa Ke Raste Men Habib Jalib Ghazals

न डगमगाए कभी हम वफ़ा के रस्ते में चराग़ हम ने जलाए हवा के रस्ते में किसे लगाए गले और कहाँ कहाँ ठहरे हज़ार ग़ुंचा-ओ-गुल हैं सबा के रस्ते में ख़ुदा का नाम कोई ले तो चौंक उठते हैं मिले हैं हम को वो रहबर ख़ुदा के रस्ते में कहीं सलासिल-ए-तस्बीह और कहीं ज़ुन्नार बिछे हैं दाम बहुत मुद्दआ के रस्ते में अभी वो मंज़िल-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र नहीं आई है आदमी अभी जुर्म ओ सज़ा के रस्ते में हैं आज भी वही दार-ओ-रसन वही...

Zarre Hii Sahii Koh Se Takraa To Gae Ham Habib Jalib Ghazals

ज़र्रे ही सही कोह से टकरा तो गए हम दिल ले के सर-ए-अर्सा-ए-ग़म आ तो गए हम अब नाम रहे या न रहे इश्क़ में अपना रूदाद-ए-वफ़ा दार पे दोहरा तो गए हम कहते थे जो अब कोई नहीं जाँ से गुज़रता लो जाँ से गुज़र कर उन्हें झुटला तो गए हम जाँ अपनी गँवा कर कभी घर अपना जला कर दिल उन का हर इक तौर से बहला तो गए हम कुछ और ही आलम था पस-ए-चेहरा-ए-याराँ रहता जो यूँही राज़ उसे पा तो गए हम अब सोच रहे हैं कि ये मुमकिन ही...

Phir Dil Se Aa Rahii Hai Sadaa Us Galii Men Chal Habib Jalib Ghazals

फिर दिल से आ रही है सदा उस गली में चल शायद मिले ग़ज़ल का पता उस गली में चल कब से नहीं हुआ है कोई शेर काम का ये शेर की नहीं है फ़ज़ा उस गली में चल वो बाम ओ दर वो लोग वो रुस्वाइयों के ज़ख़्म हैं सब के सब अज़ीज़ जुदा उस गली में चल उस फूल के बग़ैर बहुत जी उदास है मुझ को भी साथ ले के सबा उस गली में चल दुनिया तो चाहती है यूँही फ़ासले रहें दुनिया के मशवरों पे न जा उस गली में चल बे-नूर ओ बे-असर है यहाँ...