Meer Taqi Meer

Yaaro Mujhe Muaaf Rakho Main Nashe Men Huun Mir Taqi Mir Ghazals

यारो मुझे मुआ’फ़ रखो मैं नशे में हूँ अब दो तो जाम ख़ाली ही दो मैं नशे में हूँ एक एक क़ुर्त दौर में यूँ ही मुझे भी दो जाम-ए-शराब पुर न करो मैं नशे में हूँ मस्ती से दरहमी है मिरी गुफ़्तुगू के बीच जो चाहो तुम भी मुझ को कहो मैं नशे में हूँ या हाथों हाथ लो मुझे मानिंद-ए-जाम-ए-मय या थोड़ी दूर साथ चलो मैं नशे में हूँ मा’ज़ूर हूँ जो पाँव मिरा बे-तरह पड़े तुम सरगिराँ तो मुझ से न हो मैं नशे में...

Zakhm Jhele Daag Bhii Khaae Bahut Meer Taqi Meer Ghazals

ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत दिल लगा कर हम तो पछताए बहुत जब न तब जागह से तुम जाया किए हम तो अपनी ओर से आए बहुत दैर से सू-ए-हरम आया न टुक हम मिज़ाज अपना इधर लाए बहुत फूल गुल शम्स ओ क़मर सारे ही थे पर हमें इन में तुम्हीं भाए बहुत गर बुका इस शोर से शब को है तो रोवेंगे सोने को हम-साए बहुत वो जो निकला सुब्ह जैसे आफ़्ताब रश्क से गुल फूल मुरझाए बहुत ‘मीर’ से पूछा जो मैं आशिक़ हो तुम हो के...

Umr Bhar Ham Rahe Sharaabii Se Mir Taqi Mir Ghazals

उम्र भर हम रहे शराबी से दिल-ए-पुर-ख़ूँ की इक गुलाबी से जी ढहा जाए है सहर से आह रात गुज़रेगी किस ख़राबी से खिलना कम कम कली ने सीखा है उस की आँखों की नीम-ख़्वाबी से बुर्क़ा उठते ही चाँद सा निकला दाग़ हूँ उस की बे-हिजाबी से काम थे इश्क़ में बहुत पर ‘मीर’ हम ही फ़ारिग़ हुए शिताबी से – Meer Taqi Meer umr bhar ham rahe sharābī se dil-e-pur-ḳhūñ kī ik gulābī se jī Dhahā jaa.e hai sahar...

Us Kaa Khayaal Chashm Se Shab Khvaab Le Gayaa Mir Taqi Mir Ghazals

उस का ख़याल चश्म से शब ख़्वाब ले गया क़स्मे कि इश्क़ जी से मिरे ताब ले गया किन नींदों अब तू सोती है ऐ चश्म-ए-गिर्या-नाक मिज़्गाँ तो खोल शहर को सैलाब ले गया आवे जो मस्तबा में तो सुन लो कि राह से वाइज़ को एक जाम-ए-मय-ए-नाब ले गया ने दिल रहा बजा है न सब्र ओ हवास ओ होश आया जो सैल-ए-इश्क़ सब अस्बाब ले गया मेरे हुज़ूर शम्अ ने गिर्या जो सर किया रोया मैं इस क़दर कि मुझे आब ले गया अहवाल उस शिकार ज़ुबूँ का...