Mirza Ghalib

Yak Zarra E Zamiin Nahiin Be Kaar Baag Kaa Mirza Ghalib Ghazals

यक-ज़र्रा-ए-ज़मीं नहीं बे-कार बाग़ का याँ जादा भी फ़तीला है लाले के दाग़ का बे-मय किसे है ताक़त-ए-आशोब-ए-आगही खींचा है इज्ज़-ए-हौसला ने ख़त अयाग़ का बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का ताज़ा नहीं है नश्शा-ए-फ़िक्र-ए-सुख़न मुझे तिर्याकी-ए-क़दीम हूँ दूद-ए-चराग़ का सौ बार बंद-ए-इश्क़ से आज़ाद हम हुए पर क्या करें कि दिल ही अदू है फ़राग़ का बे-ख़ून-ए-दिल है...

Ye Ham Jo Hijr Men Diivaar O Dar Ko Dekhte Hain Mirza Ghalib Ghazals

ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते हैं कभी सबा को कभी नामा-बर को देखते हैं वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं नज़र लगे न कहीं उस के दस्त-ओ-बाज़ू को ये लोग क्यूँ मिरे ज़ख़्म-ए-जिगर को देखते हैं तिरे जवाहिर-ए-तुर्फ़-ए-कुलह को क्या देखें हम औज-ए-ताला-ए-लाला-ओ-गुहर को देखते हैं – Mirza Ghalib ye ham jo hijr meñ dīvār-o-dar ko dekhte haiñ kabhī sabā ko...

Ye Na Thii Hamaarii Qismat Ki Visaal E Yaar Hotaa Mirza Ghalib Ghazals

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता तिरे वा’दे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ए’तिबार होता तिरी नाज़ुकी से जाना कि बँधा था अहद बोदा कभी तू न तोड़ सकता अगर उस्तुवार होता कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता ये कहाँ की दोस्ती है कि बने हैं दोस्त नासेह कोई चारासाज़ होता कोई ग़म...

Z Bas Ki Mashq E Tamaashaa Junuun Alaamat Hai Mirza Ghalib Ghazals

ज़-बस-कि मश्क़-ए-तमाशा जुनूँ-अलामत है कुशाद-ओ-बस्त-ए-मिज़्हा सीली-ए-नदामत है न जानूँ क्यूँकि मिटे दाग़-ए-तान-ए-बद-अहदी तुझे कि आइना भी वार्ता-ए-मलामत है ब-पेच-ओ-ताब-ए-हवस सिल्क-ए-आफ़ियत मत तोड़ निगाह-ए-अज्ज़ सर-ए-रिश्ता-ए-सलामत है वफ़ा मुक़ाबिल-ओ-दावा-ए-इश्क़ बे-बुनियाद जुनूँ-ए-साख़्ता ओ फ़स्ल-ए-गुल क़यामत है – Mirza Ghalib za-bas-ki mashq-e-tamāshā junūñ-alāmat hai kushād-o-bast-e-mizhah...