Nibaah Baat Kaa Us Hiila Gar Se Kuchh Na Huaa Bahadur Shah Zafar Ghazals

निबाह बात का उस हीला-गर से कुछ न हुआ इधर से क्या न हुआ पर उधर से कुछ न हुआ जवाब-ए-साफ़ तो लाता अगर न लाता ख़त लिखा नसीब का जो नामा-बर से कुछ न हुआ हमेशा फ़ित्ने ही बरपा किए मिरे सर पर हुआ ये और तो उस फ़ित्ना-गर से कुछ न हुआ बला से गिर्या-ए-शब तू ही कुछ असर करता अगरचे इश्क़ में आह-ए-सहर से कुछ न हुआ जला जला के किया शम्अ साँ तमाम मुझे बस और तो मुझे सोज़-ए-जिगर से कुछ न हुआ रहीं अदू से वही गर्म...

Tufta Jaanon Kaa Ilaaj Ai Ahl E Daanish Aur Hai Bahadur Shah Zafar Ghazals

तुफ़्ता-जानों का इलाज ऐ अहल-ए-दानिश और है इश्क़ की आतिश बला है उस की सोज़िश और है क्यूँ न वहशत में चुभे हर मू ब-शक्ल-ए-नीश-तेज़ ख़ार-ए-ग़म की तेरे दीवाने की काविश और है मुतरिबो बा-साज़ आओ तुम हमारी बज़्म में साज़-ओ-सामाँ से तुम्हारी इतनी साज़िश और है थूकता भी दुख़्तर-ए-रज़ पर नहीं मस्त-ए-अलस्त जो कि है उस फ़ाहिशा पर ग़श वो फ़ाहिश और है ताब क्या हम-ताब होवे उस से ख़ुर्शीद-ए-फ़लक आफ़्ताब-ए-दाग़-ए...

Raftaar E Umr Qat E Rah E Iztiraab Hai Mirza Ghalib Ghazals

रफ़्तार-ए-उम्र क़त-ए-रह-ए-इज़्तिराब है इस साल के हिसाब को बर्क़ आफ़्ताब है मीना-ए-मय है सर्व नशात-ए-बहार से बाल-ए-तदर्रव जल्वा-ए-मौज-ए-शराब है ज़ख़्मी हुआ है पाश्ना पा-ए-सबात का ने भागने की गूँ न इक़ामत की ताब है जादाद-ए-बादा-नोशी-ए-रिन्दाँ है शश-जिहत ग़ाफ़िल गुमाँ करे है कि गेती ख़राब है नज़्ज़ारा क्या हरीफ़ हो उस बर्क़-ए-हुस्न का जोश-ए-बहार जल्वे को जिस के नक़ाब है मैं ना-मुराद दिल की तसल्ली को...

Sansaar Se Bhaage Phirte Ho Bhagvaan Ko Tum Kyaa Paaoge Sahir Ludhianvi Ghazals

संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पाओगे इस लोक को भी अपना न सके उस लोक में भी पछताओगे ये पाप है क्या ये पुन है क्या रीतों पर धर्म की मोहरें हैं हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे ये भोग भी एक तपस्या है तुम त्याग के मारे क्या जानो अपमान रचियता का होगा रचना को अगर ठुकराओगे हम कहते हैं ये जग अपना है तुम कहते हो झूटा सपना है हम जन्म बिता कर जाएँगे तुम जन्म गँवा कर जाओगे – Sahir...

Kyaa Kahuun Dil Maail E Zulf E Dotaa Kyuunkar Huaa Bahadur Shah Zafar Ghazals

क्या कहूँ दिल माइल-ए-ज़ुल्फ़-ए-दोता क्यूँकर हुआ ये भला चंगा गिरफ़्तार-ए-बला क्यूँकर हुआ जिन को मेहराब-ब-इबादत हो ख़म-ए-अबरू-ए-यार उन का काबे में कहो सज्दा अदा क्यूँकर हुआ दीदा-ए-हैराँ हमारा था तुम्हारे ज़ेर-ए-पा हम को हैरत है कि पैदा नक़्श-ए-पा क्यूँकर हुआ नामा-बर ख़त दे के उस नौ-ख़त को तू ने क्या कहा क्या ख़ता तुझ से हुई और वो ख़फ़ा क्यूँकर हुआ ख़ाकसारी क्या अजब खोवे अगर दिल का ग़ुबार ख़ाक से...

Tamaashaa E Dair O Haram Dekhte Hain Dagh Dehlvi Ghazals

तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं तुझे हर बहाने से हम देखते हैं हमारी तरफ़ अब वो कम देखते हैं वो नज़रें नहीं जिन को हम देखते हैं ज़माने के क्या क्या सितम देखते हैं हमीं जानते हैं जो हम देखते हैं फिरे बुत-कदे से तो ऐ अहल-ए-काबा फिर आ कर तुम्हारे क़दम देखते हैं हमें चश्म-ए-बीना दिखाती है सब कुछ वो अंधे हैं जो जाम-ए-जम देखते हैं न ईमा-ए-ख़्वाहिश न इज़हार-ए-मतलब मिरे मुँह को अहल-ए-करम देखते हैं कभी तोड़ते...

Kabhii Khud Pe Kabhii Haalaat Pe Ronaa Aayaa Sahir Ludhianvi Ghazals

कभी ख़ुद पे कभी हालात पे रोना आया बात निकली तो हर इक बात पे रोना आया हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को क्या हुआ आज ये किस बात पे रोना आया किस लिए जीते हैं हम किस के लिए जीते हैं बारहा ऐसे सवालात पे रोना आया कौन रोता है किसी और की ख़ातिर ऐ दोस्त सब को अपनी ही किसी बात पे रोना आया – Sahir Ludhianvi kabhī ḳhud pe kabhī hālāt pe ronā aayā baat niklī to har ik baat pe ronā aayā ham to samjhe...

Har Koii Dil Kii Hathelii Pe Hai Sahraa Rakkhe Ahmad Faraz Ghazals

हर कोई दिल की हथेली पे है सहरा रक्खे किस को सैराब करे वो किसे प्यासा रक्खे उम्र भर कौन निभाता है तअल्लुक़ इतना ऐ मिरी जान के दुश्मन तुझे अल्लाह रक्खे हम को अच्छा नहीं लगता कोई हमनाम तिरा कोई तुझ सा हो तो फिर नाम भी तुझ सा रक्खे दिल भी पागल है कि उस शख़्स से वाबस्ता है जो किसी और का होने दे न अपना रक्खे कम नहीं तम-ए-इबादत भी तो हिर्स-ए-ज़र से फ़क़्र तो वो है कि जो दीन न दुनिया रक्खे हँस न इतना भी...

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