Hindi Ghazal

जब तेरी याद के जुगनू चमके– Ahmad Faraz Ghazal

जब तेरी याद के जुगनू चमके देर तक आँख में आँसू चमके सख़्त तारीक[1] है दिल की दुनिया ऐसे आलम[2] में अगर तू चमके हमने देखा सरे-बाज़ारे-वफ़ा[3] कभी मोती कभी आँसू चमके शर्त है शिद्दते-अहसासे-जमाल[4] रंग तो रंग है ख़ुशबू चमके आँख मजबूर-ए-तमाशा[5]है ‘फ़राज़’ एक सूरत है कि हरसू[6] चमके …

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दिल को अब यूँ तेरी हर एक अदा लगती है– Ahmad Faraz Ghazal

दिल को अब यूँ तेरी हर एक अदा लगती है जिस तरह नशे की हालत में हवा लगती है रतजगे खवाब परेशाँ से कहीं बेहतर हैं लरज़ उठता हूँ अगर आँख ज़रा लगती है ऐ, रगे-जाँ के मकीं तू भी कभी गौर से सुन, दिल की धडकन तेरे कदमों की …

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इस से पहले कि बेवफ़ा हो जाएँ – Ahmad Faraz Ghazal

इस से पहले कि बेवफ़ा हो जाएँ क्यूँ न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ तू भी हीरे से बन गया पत्थर हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ हम भी मजबूरियों का उज़्र करें फिर कहीं और मुब्तिला हो जाएँ अब के गर तू मिले तो हम …

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अब नये साल की मोहलत नहीं मिलने वाली – Ahmad Faraz Ghazal

अब नये साल की मोहलत नहीं मिलने वाली आ चुके अब तो शब-ओ-रोज़ अज़ाबों वाले अब तो सब दश्ना-ओ-ख़ंज़र की ज़ुबाँ बोलते हैं अब कहाँ लोग मुहब्बत के निसाबों वाले ज़िन्दा रहने की तमन्ना हो तो हो जाते हैं फ़ाख़्ताओं के भी किरदार उक़ाबों वाले न मेरे ज़ख़्म खिले हैं …

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अब के रुत बदली तो ख़ुशबू का सफ़र देखेगा कौन – Ahmad Faraz Ghazal

अब के रुत बदली तो ख़ुशबू का सफ़र देखेगा कौन ज़ख़्म फूलों की तरह महकेंगे पर देखेगा कौन देखना सब रक़्स-ए-बिस्मल में मगन हो जाएँगे जिस तरफ़ से तीर आयेगा उधर देखेगा कौन वो हवस हो या वफ़ा हो बात महरूमी की है लोग तो फल-फूल देखेंगे शजर देखेगा कौन …

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आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा – Ahmad Faraz Ghazal

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा इतना मानूस न हो ख़िल्वत-ए-ग़म से अपनी तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा तुम सर-ए-राह-ए-वफ़ा देखते रह जाओगे और वो बाम-ए-रफ़ाक़त से उतर जाएगा किसी ख़ंज़र किसी तलवार को तक़्लीफ़ …

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बुझी नज़र तो करिश्मे भी रोज़ो शब के गये – Ahmad Faraz Ghazal

बुझी नज़र तो करिश्मे भी रोज़ो शब के गये के अब तलक नही पलटे हैं लोग कब के गये करेगा कौन तेरी बेवफ़ाइयों का गिला यही है रस्मे ज़माना तो हम भी अब के गये मगर किसी ने हमे हमसफ़र नही जाना ये और बात के हम साथ साथ सब …

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बरसों के बाद देखा इक शख़्स दिलरुबा सा – Ahmad Faraz Ghazal

बरसों के बाद देखा इक शख़्स दिलरुबा सा अब ज़हन में नहीं है पर नाम था भला सा अबरू खिंचे खिंचे से आँखें झुकी झुकी सी बातें रुकी रुकी सी लहजा थका थका सा अल्फ़ाज़ थे के जुग्नू आवाज़ के सफ़र में बन जाये जंगलों में जिस तरह रास्ता सा …

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बदन में आग सी चेहरा गुलाब जैसा है – Ahmad Faraz Ghazal

बदन में आग सी चेहरा गुलाब जैसा है के ज़हर-ए-ग़म का नशा भी शराब जैसा है कहाँ वो क़ुर्ब के अब तो ये हाल है जैसे तेरे फ़िराक़ का आलम भी ख़्वाब जैसा है मगर कभी कोई देखे कोई पढ़े तो सही दिल आईना है तो चेहरा किताब जैसा है …

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छेड़े मैनें कभी लब-ओ-रुख़्सार के क़िस्से – Ahmad Faraz Ghazal

छेड़े मैनें कभी लब-ओ-रुख़्सार के क़िस्से गहे गुल-ओ-बुलबुल की हिकायत को निखारा गहे किसी शहज़ादे के अफ़्साने सुनाये गहे क्या दुनिया-ए-परिस्ताँ का नज़ारा मैं खोया रहा जिन-ओ-मलैक के जहाँ में हर लहजा अगर्चे मुझे आदम ने पुकारा बरसों यूँ ही दिलजमी-ए-औरंग की ख़ातिर सौ फूल खिलाये कभी सौ ज़ख़्म ख़रीदे …

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