न जाने क्यों लोग – शिक़वा शायरी

न जाने क्यों लोग अपना बना के सज़ा देते है,
जिंदगी छीन के... ज़िन्दगी की दुआ देते है ।

- शिक़वा शायरी

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जीना तो पडेगा फकत दुनियाँ को दिखाने के लिये,वरना - मैनें कब चाही थी उसके बगैर जिदंगी । शिक़वा शायरी

कभी जो मिलें फुरसत तो बताना जरूर - वो कौन सी मौहब्बत थी जो मैं ना दे सका । शिक़वा शायरी

किरदार की अज़मत को गिरने न दिया हमने,धोखे तो बहुत खाए लेकिन धोखा न दिया हमने। शिक़वा शायरी

मुमकिन हो आपसे तो भुला दीजिये मुझे,पत्थर पे हूँ लकीर, मिटा दीजिये मुझे,हर रोज़ मुझसे ताज़ा शिकायत है आपको,मैं क्या हूँ, एक बार बता दीजिये मुझे। - शिक़वा शायरी

​क्या गिला करें उनकी बातों का,​क्या शिक़वा करें उन रातों से​​​,​​कहें भला किसकी खता इसे हम​,​​कोई खेल गया है मेरे जज्बातों से​। शिक़वा शायरी

थोडी थोडी ही सही मगर बाते तो किया करो - चुपचाप रहती हो तो खफा खफा सी लगती हो। शिक़वा शायरी

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