फ़ासले भी बहुत – ग़म शायरी

ये कैसा सिलसिला है,
तेरे और मेरे दरमियाँ,
फ़ासले भी बहुत हैं और मोहब्बत भी।

- ग़म शायरी

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ये कैसा सिलसिला है, तेरे और मेरे दरमियाँ,फ़ासले भी बहुत हैं और मोहब्बत भी। ग़म शायरी

रोज एक नई तकलीफ रोज एक नया गम,ना जाने कब ऐलान होगा कि मर गए हम। - ग़म शायरी

नफरत लाख मिली मुझे चाहत नहीं मिली,ज़िन्दगी बीत चली पर ग़म से राहत नहीं मिली,उसकी महफ़िल में हर शख्स को हँसते देखा,एक हम थे कि हँसने की भी इजाज़त नहीं मिली। ग़म शायरी

महफ़िल में हँसना हमारा मिजाज बन गया,तन्हाई में रोना एक राज बन गया,दिल के दर्द को चेहरे से जाहिर न होने दिया,बस यही जिंदगी जीने का अंदाज बन गया। - ग़म शायरी

हुस्न खो जायेगा प्यार मिट जायेगा,वक़्त के हाथ सबकुछ लुट जायेगा,हाँ रहेगी मगर याद मेरे दिल में तेरी,ग़म का समंदर तो सिमट जायेगा। - ग़म शायरी

हमसे पूछो किसीको खोने का ग़म क्या होता है,हँसते हँसते रोने का दर्द क्या होता है,खुदा उसी से क्यों मिला देता है हमें,जिसका साथ किस्मत में नहीं होता है। - ग़म शायरी

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