बेरुख़ी का मुकम्मल असर – दो लाइन शायरी

ख़ात्मा-ए-मोहब्बत मुमकिन नही है पाक मोहब्बत मे ज़नाब,
ये तो बस कुछ वक़्त की बेरुख़ी का मुकम्मल असर होती है।

- दो लाइन शायरी

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दौड़ती भागती दुनिया का यही तोहफा है,खूब लुटाते रहे अपनापन फिर भी लोग खफ़ा हैं। - दो लाइन शायरी

खफा हो कर उनसे( एडमिन द्वारा दिनाँक 27-10-2015 को प्रस्तुत )अब ढूढ़ रहे हैं वो मुझको भूल जाने के तरीके,खफा होकर उसकी मुश्किलें आसान कर दी मैंने । - दो लाइन शायरी

कभी तिनके, कभी पत्ते( एडमिन द्वारा दिनाँक 07-02-2019 को प्रस्तुत )कभी तिनके, कभी पत्ते, कभी खुशबू उड़ा लाई,हमारे घर तो आँधी भी कभी तनहा नहीं आई। - दो लाइन शायरी

मोहब्बत के काफिले को कुछ देर तो रोक लो,आते हैं हम भी पाँव से - कांटे निकाल कर। दो लाइन शायरी

आंधी ने तोड़ दी हैं( एडमिन द्वारा दिनाँक 04-02-2015 को प्रस्तुत )आंधी ने तोड़ दी हैं दरख्तों की टहनियांकैसे कटेगी रात.... परिंदे उदास हैं..। - दो लाइन शायरी

कितना दुश्वार है( एडमिन द्वारा दिनाँक 18-02-2018 को प्रस्तुत )अपनी तस्वीर बनाओगे तो अहसास होगा,कितना दुश्वार है खुद को कोई चेहरा देना। - दो लाइन शायरी

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