Mauj E Gul Mauj E Saba

  • By Admin

  • November 14, 2020

मौज-ए-गुल, मौज-ए-सबा, मौज-ए-सहर लगती है  सर से पा तक वो समाँ है कि नज़र लगती है हमने हर गाम सजदों ए जलाये हैं चिराग़  अब तेरी राहगुज़र राहगुज़र लगती है  लम्हे लम्हे बसी है तेरी यादों की महक  आज की रात तो ख़ुश्बू का सफ़र लगती है  जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं  देखना ये है कि अब आग किधर लगती है  सारी दुनिया में ग़रीबों का लहू बहता है  हर ज़मीं मुझको मेरे ख़ून से तर लगती है  वाक़या शहर में कल तो कोई ऐसा न हुआ  ये तो “अख़्तर” के दफ़्तर की ख़बर लगती है Jaan Nissar Akhtar

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सारे भूले बिसरों की याद आती है एक ग़ज़ल सब ज़ख्म हरे कर जाती है पा लेने की ख़्वाहिश से मोहतात रहो महरूमी की बीमारी लग जाती है ग़म के पीछे मारे मारे फिरना क्या...

मुद्दत में वो फिर ताज़ा मुलाक़ात का आलम  ख़ामोश अदाओं में वो जज़्बात का आलम  अल्लाह रे वो शिद्दत-ए-जज़्बात का आलम  कुछ कह के वो भूली हुई हर बात का आलम  आरिज़ से ढलकते हुए...

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हर इक सूरत हर इक तस्वीर मुबहम होती जाती है इलाही, क्या मिरी दीवानगी कम होती जाती है  ज़माना गर्मे-रफ्तारे-तरक्क़ी होता जाता है  मगर इक चश्मे -शायर है की पुरनम होती जाती है  यही जी...

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