Subha Ke Dard Ko Raaton Ki Jalan Ko Bhulen

  • By Admin

  • November 14, 2020

सुबह के दर्द को रातों की जलन को भूलें  किसके घर जायेँ कि उस वादा-शिकन को भूलें  आज तक चोट दबाये नहीं दबती दिल की  किस तरह उस सनम-ए-संगबदन को भूलें  अब सिवा इसके मदावा-ए-ग़म-ए-दिल क्या है  इतनी पी जायेँ कि हर रंज-ओ-मेहन को भूलें  और तहज़ीब-ए-गम-ए-इश्क़ निबाह दे कुछ दिन  आख़िरी वक़्त में क्या अपने चलन को भूलें Jaan Nissar Akhtar

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