Subha Ki Aas Kisi Lamhe Jo Ghat Jaati Hai

  • By Admin

  • November 14, 2020

सुबह की आस किसी लम्हे जो घट जाती है  ज़िन्दगी सहम के ख़्वाबों से लिपट जाती है  शाम ढलते ही तेरा दर्द चमक उठता है  तीरगी दूर तलक रात की छट जाती है  बर्फ़ सीनों की न पिघले तो यही रूद-ए-हयात  जू-ए-कम-आब की मानिंद सिमट जाती है  आहटें कौन सी ख़्वाबों में बसी है जाने  आज भी रात गये नींद उचट जाती है  हाँ ख़बर-दार कि इक लग़्ज़िश-ए-पा से भी कभी  सारी तारीख़ की रफ़्तार पलट जाती है Jaan Nissar Akhtar

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जब लगे ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाये है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाये तिश्नगी कुछ तो बुझे तिश्नालब-ए-ग़म की इक नदी दर्द के शहरों में बहा दी जाये दिल का...

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