Zara Si Baat Pe Har Rasm Tod Aaya Tha

  • By Admin

  • November 14, 2020

ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था  दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था  मुआफ़ कर ना सकी मेरी ज़िन्दगी मुझ को  वो एक लम्हा कि मैं तुझ से तंग आया था  शगुफ़्ता फूल सिमट कर कली बने जैसे  कुछ इस तरह से तूने बदन चुराया था  गुज़र गया है कोई लम्हा-ए-शरर की तरह  अभी तो मैं उसे पहचान भी न पाया था  पता नहीं कि मेरे बाद उन पे क्या गुज़री  मैं चंद ख़्वाब ज़माने में छोड़ आया था Jaan Nissar Akhtar

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शाम के साँवले चेहरे को निखारा जाये  क्यों न सागर से कोई चाँद उभारा जाये रास आया नहीं तस्कीं का साहिल कोई  फिर मुझे प्यास के दरिया में उतारा जाये  मेहरबाँ तेरी नज़र, तेरी अदायें...

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