शिक़वा शायरी

जहाँ दरिया कहीं अपने किनारे -शिक़वा शायरी

जहाँ दरिया कहीं अपने किनारे छोड़ देता है,कोई उठता है और तूफाँ का रुख मोड़ देता है,मुझे बे-दस्त-ओ-पा कर के भी खौफ उसका नहीं जाता,कहीं भी हादसा गुज़रे वो मुझसे जोड़ देता है।(बे-दस्त-ओ-पा = असहाय)
शिक़वा शायरी

दर्द देते हो खुद -शिक़वा शायरी

दर्द देते हो और खुद ही सवाल करते हो,तुम भी ओ सनम, क्या कमाल करते हो,देख कर पूछ लिया है हाल मेरा,चलो शुक्र है कुछ तो ख्याल करते हो।
शिक़वा शायरी

कभी उसने भी हमें चाहत -शिक़वा शायरी

कभी उसने भी हमें चाहत का पैगाम लिखा था;सब कुछ उसने अपना हमारे नाम लिखा था;सुना है आज उनको हमारे जिक्र से भी नफ़रत है;जिसने कभी अपने दिल पर हमारा नाम लिखा था।
शिक़वा शायरी

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